Advertisement

झोपड़ी में शिक्षा की लौ: नक्सल प्रभावित तकीलोड गांव में अभावों के बीच पलता भविष्य

बीजापुर/भैरमगढ़।
भैरमगढ़ विकासखंड के नदी पार स्थित अति संवेदनशील एवं नक्सल प्रभावित ग्राम तकीलोड में शिक्षा आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से संघर्ष कर रही है। वर्षों से शासकीय विद्यालय भवन के बिना चल रहे इस गांव में बच्चों की पढ़ाई झोपड़ीनुमा अस्थायी व्यवस्था के सहारे संचालित हो रही है। बावजूद इसके, शिक्षा के प्रति बच्चों, शिक्षकों और ग्रामीणों की प्रतिबद्धता कमजोर नहीं पड़ी है।

घने जंगलों से घिरे और सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील इस क्षेत्र में न तो पक्की इमारत है और न ही पर्याप्त संसाधन। खुले मैदान में मिट्टी के फर्श पर बैठकर बच्चे पढ़ाई करते हैं। चारों ओर लकड़ी और बांस की अस्थायी घेराबंदी कर झोपड़ी को स्कूल का स्वरूप दिया गया है। बरसात और तेज धूप के मौसम में यह व्यवस्था और भी कठिन हो जाती है, फिर भी कक्षाएं नियमित रूप से संचालित की जा रही हैं।

गांव के शिक्षकों का कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है। शिक्षक नियमित रूप से विद्यालय पहुंचकर पाठ्यक्रम पढ़ा रहे हैं और बच्चों को अनुशासन व स्वच्छता का महत्व भी समझा रहे हैं। बच्चों में सीखने की ललक स्पष्ट दिखाई देती है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद की किरण बनकर सामने आती है।

ग्रामीणों ने बताया कि गांव में स्थायी विद्यालय भवन की मांग वर्षों से की जा रही है, लेकिन अब तक शासन-प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है। शिक्षा, पेयजल, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बच्चों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद ग्रामीण शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए अपने स्तर पर सहयोग कर रहे हैं।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने विधायक विक्रम मांडवी सहित जिला प्रशासन से मांग की है कि तकीलोड गांव में शीघ्र स्थायी विद्यालय भवन का निर्माण कराया जाए तथा बच्चों के लिए पेयजल, शौचालय, बैठने की उचित व्यवस्था और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो बच्चों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा को मजबूती देने के सरकारी दावों के बीच तकीलोड गांव की यह तस्वीर जमीनी हकीकत को उजागर करती है। झोपड़ी में चल रहा यह स्कूल न केवल व्यवस्था की कमी को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा की लौ बुझने नहीं दी गई है। अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन-प्रशासन कब तक इस ओर ठोस कदम उठाता है और तकीलोड के बच्चों को एक सुरक्षित और सुविधायुक्त शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराता है।